
रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार।। भादव माह की तीज तिथि को महिलाओं द्वारा हरतालिका तीज का व्रत किया गया। हरतालिका तीज का व्रत का विधान पौराणिक मान्यता अनुसार माता पार्वती की कथा से जुड़ा है! जिन्होंने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी
भादव माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका व्रत किया जाता है । उक्त व्रत सौभाग्यवती स्त्रियां अपने अखंड सौभाग्य हेतु और कुंवारी कन्याएं शंकर जैसा श्रेष्ठ वर पाने हेतु करती है। हरतालिका व्रत का महत्व बताते हुए पौराणिक कथाओं में बताया गया है कि इस व्रत में पार्थिव शिवलिंग बनाकर बिल्वपत्र, शमीपत्र, धतूरा, पंचखोखा, अर्पित कर पूजा की जाती है और अन्न, फलों का त्यागकर व्रत रखकर रात्रि जागरण करके भगवान् शंकर की आराधना कर मध्य रात्रि में आरती की जाती हैं।
शास्त्रों में उल्लेख है कि एक बार भगवान् शंकर और माता पार्वती कैलाश पर्वत पर बैठे थे, तो भगवान् शंकर माता पार्वती को पूर्व जन्म के स्मरण करवाने के उद्देश्य से कथा सुनाते हैं कि हे गौरी! पर्वत राज हिमालय पर गंगा तट पर तुमने अपनी बाल्यावस्था में अधोमुखी होकर घोर तप किया था। इस अवधि में अन्न न खाकर केवल हवा का सेवन किया था, फिर कुछ समय पत्ते खा, माघ मास में, शीतल जल में प्रवेश कर तप किया । वैशाख में उष्ण में पंचाग्नि में तपस्या की, श्रावण की वर्षा में खुले आसमान तले, बिना अन्न ग्रहण किए व्यतीत किए। इस तप करते हुए देख तुम्हारे पिता हिमवान बहुत दुखी हुए और सोचा कि इतनी तपधारी कन्या को मैं किसे वरूंगा। उसी समय नारद जी का आगमन होता है और कहा कि मुझे भगवान् विष्णु ने भेजा है। आपकी कन्या के तप से प्रसन्न होकर वे कन्या से विवाह करना चाहते हैं। इस बात को सुन पिताजी प्रसन्न हुए। लेकिन जब तुमने यह बात सुनी तो तुमने अपनी सखी आलिया को यह बात कही और बताया कि मैं पति रूप में शंकर का वरण करना चाहती हूं। तब आलिया ने कहा कि हम वन को चलते हैं और इस तरह आलिया नाम की सखी तुम्हें हर कर ले गई थी। इसलिए इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ा।
आध्यात्मिक दृष्टि से विचार किया जाए तो किसी भी व्रत को धारण करने से पहले तप आवश्यक है। यहां तप से आशय है, वन में जाकर किए जाने वाले तप से नहीं अपितु ब्रह्मचर्य तप से हैं। यही तप अभीष्ट है। तप के बिना किसी भी प्रकार का देव निमित्त किया गया कर्म फलदाई नहीं होता है। तप के प्रभाव से हम तीनों गुणों यथा सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण पर, विजय प्राप्त कर सकते हैं और तभी तीज व्रत सम्पन्न होता है। गुणों पर विजय प्राप्त किए बिना, पूरे जीवन काल भी हरतालिका व्रत किया जाए तो कोई भी अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा।
मान्यता है कि उदयातिथि में व्रत रखना शास्त्र सम्मत होता है। इसलिए 26 अगस्त को हरतालिका तीज का पर्व हर्षोल्लास व उत्साह के साथ मनाया गया। इस बार हरतालिका तीज पर हस्त नक्षत्र, शुभ योग और रवि योग इस पर्व को साधारण से असाधारण बना रहे है। व्रत को विधिविधान पूर्वक करने से महिलाओं का अखंड सौभाग्य बना रहता है।
सोलह श्रृंगार करती हैं महिलाएं
इस दिन सुहागिन महिलाएं 16 श्रृंगार करती हैं। पूजा के अंतर्गत मिट्टी या रजत स्वर्ण आदि धातु से निर्मित शिव पार्वती की मूर्ति का पांचों पहर पूजन करने का भी विधान है।
शिव और पार्वती के साथ ही गणेश जी की भी पूजा की जाती है। इस दिन हरतालिका तीज से संबंधित कथा का श्रवण किया जाता है। नैवेद्य के तौर पर सूखा मेवा ऋतुफल, मिष्ठान्न आदि अर्पित किए जाते हैं। रात भर जागरण कर देवादिदेव महादेव की भक्तिभाव से आराधना कर सूर्योदय के पहले पार्थिव शिवलिंग का विधि पूर्वक जल में विसर्जन किया गया। व्रत का पारणा चतुर्थी तिथि के दिन किया गया।